मंत्री और सरकारी मुलाजिम मस्त,बेरोजगार,किसानऔर मजदूर त्रस्त...

# Admin | 19 Jul, 2021

मंत्री और सरकारी मुलाजिम मस्त,बेरोजगार,किसानऔर मजदूर त्रस्त...

◆ शासन - प्रशासन को ना कोई परवाह, ना गरीब तपके के लोगों के लिए सरकारी तंत्र के पास कोई नई निति अथवा कार्ययोजना।

◆ कोरोना संक्रमण बढ़ने पर सरकारी नुमाइंदो को सिर्फ लॉकडॉऊन का सूझता है विकल्प।

◆ प्रशासनिक अफसर, स्वास्थ्य अमला और पुलिस - प्रशासन के कार्य सराहनीय,,,अपनी ड्यूटी में हैं मुस्तैद।

मिशन क्रांति न्यूज. जांजगीर-चाम्पा। सरकार और प्रशासन कोरोना काल की तीसरी लहर से निपटने तैयारी में मुस्तैद होने का राग अलाप रहे है लेकिन कोविड 19 की पहली लहर और दूसरी लहर में लाकडॉऊन से खासकर गरीब किसान,मजदूर, प्राइव्हेट जॉब करने वाले और बेरोजगारों की हालत क्या रही और वर्तमान में क्या.है...इससे ना सरकार को कोई मतलब है और ना ही सरकारी नुमाइंदो को इसकी परवाह। प्रशासनिक अफसर, स्वास्थ्य अमला और पुलिस - प्रशासन मुस्तैदी से काम करते नजर आए और अब भी लगे हुए हैं इन्हे छोड़कर ज्यादातर सरकारी अमलों को बिना कामकाज के बकायदा वेतनमान मिल रहा है। वहीं गरीब मजदूर किसान,प्राइवेट जॉब,छोटे व्यापारी और बेरोजगारों की हालत पस्त है।

वैश्विक महामारी कोरोना का यह समय खासकर गरीब तपके के लिए मुसिबत का सबब बन गया है,, जहां लॉकडाऊन में कामकाज ठप हो जाने से लोगों के सामने रोजी रोटी की समस्या बनी रहती है, भूखे मरने की नौबत तक आ जाती है। वहीं दूसरी ओर लॉकडाऊन खुलते ही कर्ज से लदे ये गरीब काम पर चले जाते हैं लेकिन जैसे ही कामकाज ,मजदूरी से कुछ मजदूरी मिलना शुरू होता है...वैसे ही सरकार के फरमान मिलते ही सरकारी तंत्र लॉकडाऊन कर देती है लेकिन इनके खाने पीने की व्यवस्था करने कोई ध्यान नही रहता...क्या सरकार की जवाबदेही नही की सब कुछ बंद करने.से.पहले गरीबों के घर में भी झांककर देख ले...इन्हें भी भूख लगती है जनाब...पर नहीं यह देश तो मानो सिर्फ सरकारी मुलाजिमों के लिए है...गरीब मजदूर,,,किसान और बेरोजगारों के लिए तो इनके पास आज पर्यन्त ना कोई कार्य योजना है और ना ही कोई तैयारी बस कोरोना संक्रमण की फिक्र है लेकिन भूख में मरने वालों की परवाह नहीं। ऐसे हालात में गरीब आत्महत्या करने मजबूर ना हो जाए...सरकार और सरकरी तंत्र इस ओर ध्यनाकर्षण कर विकल्प तलाशे। और उसे मूर्त रूप दे ताकि आम जनता राहत की संस ले सके।

लोकतंत्र में, यही है सबका साथ,सबका विकास !

 केंद्र की भाजपा सरकार जहां सबका साथ सबका विकास की राग अलापते रहते है...क्या पता है देश के अंतिम छोर में बैठे अन्नदाता किसानों का यह देश है जो कोरोना के लाकडाऊन से हलाकान है ...मजदूर काम नही मिलने से पलायन कर जीविकोपार्जन में लगा है। प्राइ्वेट जॉब और बेरोजगारों की हालत तो बद से बदतर है ...पर ना तो इस ओर केंद्र सरकार का ध्यान है ना राज्य सरकार को परवाह। बस गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की राग अलाप रहे हैं।

ये शर्म बेच खाए हैं जनाब...ये देश के कर्णधार और सरकारी नुमाइंदे जो ठहरे

 केंद्र की सरकार हो या राज्य की सरकार लोकतंत्र की बड़ी बड़ी बातें जरूर करती है...लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नही है। जनता मौलिक अधिकार से वंचित है। देश के कर्णधारों को शर्म तो आती है नही ...अगर शर्म आती तो गांव के गरीब तपके की सूध लेते,किसानों और मजदूरों की पीड़ा समझते और बेरोजगारों के लिए रोजगार मुहैया कराई जाती। सब योजनाएं फिसड्डी साबित हो रही है। कुछ योजनाएं तो महज कागजो तक ही में सिमट कर रह गई है।

जनहित के मुद्दे पर मीडिया से बात करने में भी कोताही बरत रहे जनप्रतिनिधि

जनहित से जुड़े कुछ मुद्दों को लेकर जब जांजगीर चाम्पा जिले के कुछ विधायकों से मोबाईल के जरिए बात करने की कोशिश की गई तो वे मीडिया से बचते नजर आए...ऐसे में जनहित के मुद्दे पर मीडिया के सामने अपनी बातें रखने में कोताही बरत रहे ऐसे जनप्रतिनिधियों से जनता की समस्याओं का समाधान की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है। बता दें कि "मिशन क्रांति न्यूज" टीम द्वारा पामगढ़ विधायक श्रीमती इंदु बंजारे, अकलतरा विधायक सौरभ सिंह और जैजैपुर विधायक केशव चंद्रा से जब उक्त मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों की राय जानने मोबाइल से संपर्क साधा गया तो उक्त मुद्दे को लेकर जवाब देना भी मुनासिब नही समझे। ऐसे में मीडिया से दूरी बनाने वाले ऐसे जनप्रतिनिधि आखिर जनता से सीधा संवाद या उनकी समस्याओं को कितनी गंभीरता से लेते होंगें यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मजे की बात तो यह है कि ये तीनों विधायक सत्ता पक्ष के नहीं है इसके बावजूद सत्ता के खिलाफ अपनी बात खुलकर रखने में परहेज कर रहे हैं।

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